शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

यूपी बोर्ड क्लास 10 हिंदी व्याकरण ' अलंकार ' ।

                          ग.   अलंकार

      काव्य की शोभा बढ़ाने वाले उपकरणों को अलंकार कहते हैं। इसके प्रयोग से शब्द और अर्थ में चमत्कार उत्पन्न होता है । अतः अलंकार को काव्य का आवश्यक अंग माना गया है।
     अलंकार के दो भेद किए गए हैं - १. शब्दालंकार ,  २. अर्थालंकार। 

     जब केवल शब्दों में चमत्कार पाया जाता है , तब शब्दालंकार और जब अर्थ में चमत्कार होता है तब अर्थालंकार कहलाता है।  नीचे कुछ प्रमुख अलंकारों का वर्णन किया जा रहा है । उपमा,  रूपक तथा उत्प्रेक्षा अलंकार ही पाठ्यक्रम में निर्धारित है।

 (i) उपमा
    "जहां दो भिन्न पदार्थ अथवा व्यक्तियों में समान गुण आदि के कारण सादृस्य या साधर्म्य  की स्थापना की जाती है , वहां उपमा अलंकार होता है ।" उपमा अलंकार के चार अंग होते हैं -

 (क) उपमेय या प्रस्तुत
      वह वस्तु अथवा व्यक्ति जिसकी एक किसी दूसरे वस्तु अथवा व्यक्ति से तुलना की जाती है दूसरे शब्दों में वर्णन के विषय को 'उपमेय' कहत हैं।

 (ख) अपमान या अप्रस्तुत
   जिस वस्तु अथवा व्यक्ति से उपमेयर की समता की जाती है उसे 'अपमान' कहते हैं।

(ग) साधारण धर्म
   वह गुण या शब्द जिसके कारण उपमेय तथा उपमान में समानता दिखाया जाए, 'साधारण धर्म' कहलाता है।

(घ) वाचक
   वह पद या शब्द जिसके द्वारा उपमेय तथा अपमान की समानता प्रकट हो उसे 'वाचक' कहते हैं।

   'करि कर सरिस सुभग भुजदंडा'। यहां 'भुजदंडा' उपमेय, 'करि कर' उपमान , 'सरिस' वाचक शब्द तथा 'सुभग' साधारण धर्म है। इस उदाहरण में उपमा के चारों अंग विद्यमान है। अतः यह पूर्णोपमा है।

  ' पीपल पात सरिस मन डोला' भी पूर्णोपमा का उदाहरण है। यदि उपमा का कोई अंग नहीं होता तो वह लुप्तोपमा उदाहरण कहलाता है।

   (ii) रूपक
   जहां अपमेय में उपमान का भेद रहित आरोप हो वहां रूपक अलंकार होता है।  रूपक अलंकार में उपमेयर और उपमान में कोई भेद नहीं रहता।
  उदाहरण
                                  " चरण कमल बंदौ हरि राइ।"
  इस उदाहरण में चरण प्रस्तुत और कमल अप्रस्तुत है, चरण में कमल का आरोप है।
  अन्य उदाहरण -
                                    उदित उदयगिरि मंच पर , रघुवर बाल पतंग।
                                    बिकसे संत सरोज सब,  हरसे लोचन भृंग।।
   (iii) उत्प्रेक्षा 
   जहां उपमेयर में  अपमान की संभावना की जाए वहां उत्प्रेक्षा अलंकार होता है । जनु जानो मनु मानो जनौ मनौ आदि इसके वाचक शब्द हैं।
   उदाहरण
                                   सोहत ओढ़ै पीतु पटु, श्याम सलोनें गाय। 
                                   मनौ नीलमणि सैल पर , आतप पर्यो प्रभात।।
      इस दोहे में 'पीतु पटु' में आतप तथा 'श्याम सलौने गात' में नीलमणि सैल की संभावना प्रकट की गई है और 'मनौ' शब्द का प्रयोग भी है । अतः यहां उत्प्रेक्षा अलंकार है। 

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

यूपी बोर्ड क्लास 10 हिंदी व्याकरण ' छंद ' ।

                          ख   छन्द

छन्द काव्य के प्रवाह को लययुक्त , संगीतात्मक , शुव्यवस्थित, और नियोजित करता है। छन्दबद्ध होकर भाव अधिक प्रभावशाली अधिक हृदय ग्राही और स्थाई हो जाता है । छन्द काव्य को स्मरण योग्य बना देता है ।
छन्द के प्रत्येक चरण में वर्णों का क्रम अथवा मात्राओं की संख्या निश्चित होती है।

मात्रा

मात्रा भेद से वर्ण दो प्रकार के होते हैं। ह्रस्व एवं दीर्घ वर्ण के उच्चारण करने में जो समय लगता है उसे मात्रा कहा जाता है। अ इ उ ए ऋ के उच्चारण में जो समय लगता है उसकी एक मात्रा होती है, तथा उनके संयुक्त व्यंजनों आ ई ऊ ऐ ओ औ के उच्चारण में जो समय लगता है उसकी दो मात्राएं मानी गई है । 

व्यंजन स्वत: उच्चरित नहीं हो सकते हैं अतः मात्रा की गणना शुरू के आधार पर होती है ह्रस्व और दीर्घ को पिंगल शास्त्र में क्रमशः लघु और गुरु कहते हैं लघु का चिन्ह है , तथा गुरु का चिन्ह S है।

यति  (विराम)

छन्द की एक लय होती है, उसे गति या प्रवाह भी कहते हैं लय का ज्ञान अभ्यास पर निर्भर है। छंदों में विराम के नियम का पालन भी किया जाता है - छन्द के प्रत्येक चरणों में उच्चारण करते समय मध्य या अंत में जो विराम होता है उसे यति कहा जाता है।

पाद या चरण

छन्द में प्रायः चार पंक्तियां होती हैं, छन्द की एक पंक्ति का नाम 'पाद' है , इसी 'पाद' को उस छन्द का चरण कहा जाता है। पहले और तीसरे चरण को विषम तथा दूसरे और चौथे चरण को सम चरण कहते हैं -
                                      ककुभ शोभित गोरज बीच से।
                                      निकलते बज वल्लभ यों लसे।
                                      कदन जो करके दिसि कालिमा।
                                      बिलसता  नभ  में  नलिनीश  है।
इस छन्द में चार पंक्तियां चरण है एक-एक पंक्ति चरण या पाद है । कुछ चार चरणो वाले छंदों को दो पंक्तियों में भी लिख देने की प्रथा चल पड़ी है।

गुरु- लघु

(१) अनुस्वारयुक्त (ं) शब्द गुरु माना जाता है उदाहरण के लिए 'संत' और 'हंस' शब्द के 'सं' और 'हं' शब्द गुरु हैं।

(२) निसर्ग (:) से युक्त वर्ण गुरु माना जाता है। उदाहरण के लिए 'अतः' शब्द में 'त:' गुरु वर्ण है।

(३) संयुक्ताक्षर से पूर्व का लघु वर्ण गुरु माना जाता है , जैसे  'गन्ध' शब्द में 'न्ध' संयुक्ताक्षर है, अतः 'ग' लघु होते हुए भी गुरु है। परंतु जब संयुक्ताक्षर से पूर्व वर्ण पर अधिक बल नहीं रहता तब वह लघु ही माना जाता है जैसे 'तुम्हारे' में 'तु' लघु है।

(४) चंद्रबिंदु से युक्त लघु वर्ण लघु ही रहता है , जैसे- 'हॅसना' का 'हॅ' लघु है।

(५) कभी-कभी दीर्घ वर्ण भी आवश्यकता अनुसार ह्रस्व पढ़ा जाता है , जैसे - 'करते जो वन सुर नर मुनि भावन' में 'जो' दीर्घ ही पड़ा जाएगा इसी प्रकार 'अवधेश के द्वारे सकारे गयी' में 'के' दीर्घ होते हुए भी लघु ही पढ़ा जाएगा तात्पर्य यह है कि किसी ध्वनि का लघु अथवा गुरु होना उसके उच्चारण में लिए गए समय पर निर्भर है।

                                  छन्द के प्रकार

१. वर्णिक,  २. मात्रिक,  ३. मुक्तक ।
(१) वर्णिक छंद -
      वर्णिक वृत्तों के प्रत्येक चरण का निर्माण वर्णों की एक निश्चित संख्या एवं लघु गुरु के क्रम के अनुसार होता है। वर्णिक व्रत्तो में अनुष्टुप्, द्रुतविलंबित, मालिनी, शिखरिणी आदि छन्द प्रसिद्ध है।

(२) मात्रिक छन्द -
     मात्रिक छंद वे हैं, जिनकी रचना में चरण की मात्राओं की गणना होती है। दोहा, सोरठा, रोला, चौपाई, आदि मात्रिक छन्द हैं।

(३) मुक्तक छंद -
     हिंदी में स्वतंत्र रूप से आज लिखे जा रहे छंद मुक्त छन्द है, जिनमें वर्ण मात्रा का कोई बंधन नहीं है। मात्रिक छंदों में पाठ्क्रमानुसार दोहा और सोरठा का लक्षण एवं उदाहरण निम्नलिखित है -

(१) सोरठा
     यह दोहे का उल्टा होता है इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में 11-11 मात्राएं तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में 13-13 मात्राएं होती हैं।
     उदाहरण -
                 S   । । । ।    । ।    S ।
                जो  सुमिरत  सीधी  हुई,                11 मात्राएं
                । । S । ।   । । । ।   । । ।
               गणनायक  करिवर  बदन।              13 मात्राएं
               । । ।     । S । ।      S ।
               करहु     अनुग्रह     सोय,।              11 मात्राएं
               S ।    S ।  । ।   । ।   । । ।      
              बुद्धि- रासि शुभ -गुन- सदन।           13 मात्राएं

(२) रोला
     यह सब मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं होती हैं। 11 और 13 मात्राओं पर यदि होती है।
     उदाहरण -
                । ।    S । ।   S S ।   S ।   । ।  । । । ।   S । ।
               कोउ  पापिह  पंचत्व  प्राप्त सुनि जमगन  धावत।
               बनि  बनि  बावन  वीर  बढ़त  चौचंद  मचावत।
               पै  तकि  ताकी  लोथ  त्रिपथगा  के  तट लावत।
               नौ  व्दै,  ग्यारह  होत  तीन  पांचहिं   बिसरावत।।

    इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं हैं 11-13 पर यति है।  अतः यह छन्द रोल है।

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

यूपी बोर्ड क्लास 10 हिंदी व्याकरण 'रस'।

                            (क) रस 

आचार्यों ने रस को काव्य की आत्मा कहा है। कविता पढ़ने अथवा नाटक देखने से पाठक या दर्शक को जो आनंद प्राप्त होता है, वह रस कहलाता है।

रस के चार अंग माने गए हैं - स्थाई भाव, विभव, अनुभव और संचारी भाव।

(i) स्थाई भाव :-
सहृदय के हृदय में जो भाव स्थाई रूप से विद्यमान रहते हैं, उन्हें स्थाई भाव कहते हैं। यही भाव रसत्व को प्राप्त होते हैं।
प्राचीन भारतीय आचार्यों ने स्थाई भाव नौ माने थे, परंतु बाद में 'वात्सल्य' और 'भक्ति' रस को भी इसी में जोड़कर अब इनकी संख्या 11 हो गई है।

(ii) विभव :-
जिसके कारण सहृदय को रस प्राप्त होता है, वह विभाव कहलाता है अर्थात स्थाई भाव का कारण विभाव है।
 विभव दो प्रकार के होते हैं - (क) आलंबन विभाव,  (ख) उद्दीपन विभाग।

(क)  आलंबन विभाव :-
वह कारण है जिस पर भाव अवलंबित रहता है अर्थात जिस व्यक्ति या वस्तु के प्रति मन में स्थाई भाव उत्पन्न हो उसे आलंबन कहते हैं और जिस व्यक्ति के मन में स्थाई भाव उत्पन्न होते हैं उसे आश्रय कहते हैं।
 जैसे पुत्र रोहिताश्व की मृत्यु पर विलाप करती हुई शैव्या।
इसमें शैव्या आश्रय है, रोहिताश्व आलंबन है और स्थाई भाव शोक है।

(ख) उद्दीपन विभाव :-
जो आलंबन द्वारा उत्पन्न भाव को उद्दीप्त करते हैं, उन्हें उद्दीपन विभाव कहते हैं ।
जैसे भय  स्थाई भाव को उद्दीप्त करने के लिए सिंह का गर्जना, उसका खुला मुख, जंगल की भयानकता आदि उद्दीपन विभाव हैं।

(iii)  अनुभाव :-
स्थाई भाव के जागृत होने पर आश्रय की बाह्य चेष्टाओं को अनुभाव कहते हैं,
 जैसे भय उत्पन्न होने पर हक्का-बक्का हो जाना, रोंगटे खड़े होना, कांपना, पसीने का आना आदि।

(iv) संचारी भाव :-
आश्रय के मन में उठने वाले अस्थिर मनोविकारों को संचारी भाव कहते हैं । यह मनोविकार पानी के बुलबुलों की भांति बनते- मिटाते रहते हैं, जबकि स्थाई भाव अंत तक बने रहते हैं।
कक्षा 10 की पाठ्य पुस्तक में हास्य और करुण रस ही हैं, अतः उनका उल्लेख यहां किया जा रहा है :-

(i) हास्य रस
जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से हास नामक स्थाई भाव जागृत होता है, तो हास्य रस की निष्पत्ति होती है।
उदाहरण -
   विंध्य के बासी उदासी तपोव्रतधारी महाविनु नारि दुखारे।
   गोतमतीय तरी, तुलसी, सो कथा सुनि में मुनिबृंद सुखारे।।
   ह्वैहैं  सिला सब चंद्रमुखी पर से पद -मंजुल- कंज तिहारे।
   कीन्ही भली रघुनायकजू करुणा करि कानन को पगु धारे।।

(ii) करुण रस 
शोक नामक स्थाई भाव, विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव के संयोग से करुण रस की निष्पत्ति होती है, अर्थात "प्रिय वस्तु तथा व्यक्ति के नाश या अनिष्ट से हृदय में उत्पन्न 'क्षोभ' को करुण रस कहते हैं।"
उदाहरण -
                        "मणि खोए भुजंग - सी जननी,
                         फन - सा पटक रही थी शीश,
                         अन्धी आज बना कर मुझको,
                         किया न्याय तुमने जगदीश ?"

इसमें स्थाई भाव - शोक, विभव (आलंबन) - श्रवण, आश्रय - पाठक, उद्दीपन - दशरथ की उपस्थिति, अनुभाव - सिर पटकना,  संचारी भाव - स्मृति विषाद प्रलाप आदि। इसके संयोग से करुण रस की निष्पत्ति हुई है।
इसी प्रकार सभी 11 रस और उनके स्थाई भाव यहां पर लिखे जा रहे हैं-

स्थाई भाव                 रस
१. रति।                               श्रृंगार
२. हास।                              हास्य।
३. शोक।                             करुण।
४. क्रोध।                             रौद्र।
५. उत्साह।                          वीर।
६. भय।                              भयानक।
७. जुगुप्सा।                         वीभत्स।
८. विस्मय।                         अद्भुत।
९. निर्वेद।                           शांत।
१०. वात्सल्य।                      वात्सल्यता।
११. भक्ति।                         भक्ति।




यूपी बोर्ड क्लास 10 हिंदी व्याकरण ' अलंकार ' ।

                          ग.   अलंकार       काव्य की शोभा बढ़ाने वाले उपकरणों को अलंकार कहते हैं। इसके प्रयोग से शब्द और अर्थ में चमत्कार उत...