गुरुवार, 1 जनवरी 2026

यूपी बोर्ड क्लास 10 हिंदी व्याकरण ' छंद ' ।

                          ख   छन्द

छन्द काव्य के प्रवाह को लययुक्त , संगीतात्मक , शुव्यवस्थित, और नियोजित करता है। छन्दबद्ध होकर भाव अधिक प्रभावशाली अधिक हृदय ग्राही और स्थाई हो जाता है । छन्द काव्य को स्मरण योग्य बना देता है ।
छन्द के प्रत्येक चरण में वर्णों का क्रम अथवा मात्राओं की संख्या निश्चित होती है।

मात्रा

मात्रा भेद से वर्ण दो प्रकार के होते हैं। ह्रस्व एवं दीर्घ वर्ण के उच्चारण करने में जो समय लगता है उसे मात्रा कहा जाता है। अ इ उ ए ऋ के उच्चारण में जो समय लगता है उसकी एक मात्रा होती है, तथा उनके संयुक्त व्यंजनों आ ई ऊ ऐ ओ औ के उच्चारण में जो समय लगता है उसकी दो मात्राएं मानी गई है । 

व्यंजन स्वत: उच्चरित नहीं हो सकते हैं अतः मात्रा की गणना शुरू के आधार पर होती है ह्रस्व और दीर्घ को पिंगल शास्त्र में क्रमशः लघु और गुरु कहते हैं लघु का चिन्ह है , तथा गुरु का चिन्ह S है।

यति  (विराम)

छन्द की एक लय होती है, उसे गति या प्रवाह भी कहते हैं लय का ज्ञान अभ्यास पर निर्भर है। छंदों में विराम के नियम का पालन भी किया जाता है - छन्द के प्रत्येक चरणों में उच्चारण करते समय मध्य या अंत में जो विराम होता है उसे यति कहा जाता है।

पाद या चरण

छन्द में प्रायः चार पंक्तियां होती हैं, छन्द की एक पंक्ति का नाम 'पाद' है , इसी 'पाद' को उस छन्द का चरण कहा जाता है। पहले और तीसरे चरण को विषम तथा दूसरे और चौथे चरण को सम चरण कहते हैं -
                                      ककुभ शोभित गोरज बीच से।
                                      निकलते बज वल्लभ यों लसे।
                                      कदन जो करके दिसि कालिमा।
                                      बिलसता  नभ  में  नलिनीश  है।
इस छन्द में चार पंक्तियां चरण है एक-एक पंक्ति चरण या पाद है । कुछ चार चरणो वाले छंदों को दो पंक्तियों में भी लिख देने की प्रथा चल पड़ी है।

गुरु- लघु

(१) अनुस्वारयुक्त (ं) शब्द गुरु माना जाता है उदाहरण के लिए 'संत' और 'हंस' शब्द के 'सं' और 'हं' शब्द गुरु हैं।

(२) निसर्ग (:) से युक्त वर्ण गुरु माना जाता है। उदाहरण के लिए 'अतः' शब्द में 'त:' गुरु वर्ण है।

(३) संयुक्ताक्षर से पूर्व का लघु वर्ण गुरु माना जाता है , जैसे  'गन्ध' शब्द में 'न्ध' संयुक्ताक्षर है, अतः 'ग' लघु होते हुए भी गुरु है। परंतु जब संयुक्ताक्षर से पूर्व वर्ण पर अधिक बल नहीं रहता तब वह लघु ही माना जाता है जैसे 'तुम्हारे' में 'तु' लघु है।

(४) चंद्रबिंदु से युक्त लघु वर्ण लघु ही रहता है , जैसे- 'हॅसना' का 'हॅ' लघु है।

(५) कभी-कभी दीर्घ वर्ण भी आवश्यकता अनुसार ह्रस्व पढ़ा जाता है , जैसे - 'करते जो वन सुर नर मुनि भावन' में 'जो' दीर्घ ही पड़ा जाएगा इसी प्रकार 'अवधेश के द्वारे सकारे गयी' में 'के' दीर्घ होते हुए भी लघु ही पढ़ा जाएगा तात्पर्य यह है कि किसी ध्वनि का लघु अथवा गुरु होना उसके उच्चारण में लिए गए समय पर निर्भर है।

                                  छन्द के प्रकार

१. वर्णिक,  २. मात्रिक,  ३. मुक्तक ।
(१) वर्णिक छंद -
      वर्णिक वृत्तों के प्रत्येक चरण का निर्माण वर्णों की एक निश्चित संख्या एवं लघु गुरु के क्रम के अनुसार होता है। वर्णिक व्रत्तो में अनुष्टुप्, द्रुतविलंबित, मालिनी, शिखरिणी आदि छन्द प्रसिद्ध है।

(२) मात्रिक छन्द -
     मात्रिक छंद वे हैं, जिनकी रचना में चरण की मात्राओं की गणना होती है। दोहा, सोरठा, रोला, चौपाई, आदि मात्रिक छन्द हैं।

(३) मुक्तक छंद -
     हिंदी में स्वतंत्र रूप से आज लिखे जा रहे छंद मुक्त छन्द है, जिनमें वर्ण मात्रा का कोई बंधन नहीं है। मात्रिक छंदों में पाठ्क्रमानुसार दोहा और सोरठा का लक्षण एवं उदाहरण निम्नलिखित है -

(१) सोरठा
     यह दोहे का उल्टा होता है इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में 11-11 मात्राएं तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में 13-13 मात्राएं होती हैं।
     उदाहरण -
                 S   । । । ।    । ।    S ।
                जो  सुमिरत  सीधी  हुई,                11 मात्राएं
                । । S । ।   । । । ।   । । ।
               गणनायक  करिवर  बदन।              13 मात्राएं
               । । ।     । S । ।      S ।
               करहु     अनुग्रह     सोय,।              11 मात्राएं
               S ।    S ।  । ।   । ।   । । ।      
              बुद्धि- रासि शुभ -गुन- सदन।           13 मात्राएं

(२) रोला
     यह सब मात्रिक छंद है इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं होती हैं। 11 और 13 मात्राओं पर यदि होती है।
     उदाहरण -
                । ।    S । ।   S S ।   S ।   । ।  । । । ।   S । ।
               कोउ  पापिह  पंचत्व  प्राप्त सुनि जमगन  धावत।
               बनि  बनि  बावन  वीर  बढ़त  चौचंद  मचावत।
               पै  तकि  ताकी  लोथ  त्रिपथगा  के  तट लावत।
               नौ  व्दै,  ग्यारह  होत  तीन  पांचहिं   बिसरावत।।

    इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं हैं 11-13 पर यति है।  अतः यह छन्द रोल है।

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